Wednesday, September 15, 2010

मन में आस

पूरब में सूरज की लाली
देख प्रियतम हर्षाये
उगते सूर्य की तरुनाई
मन में आस जगाये

सर सर बहती ठंडी हवाएं
तन मन दोनों सिहराए
भोर में करते खग कलरव
धीमा मीठा संगीत सुनाये

आँगन में अनमन सी फिरूँ
पायल की रुनझुन न भाए
अँखियाँ राह पे टंगी हुई
मेरी चूनर सरकी जाये

खड़ी अटारी जिसे निहारूं
वे तो नजर न आये
कहाँ छिपे मनमीत मेरे
दिल का चैन चुराए .

10 comments:

  1. खड़ी अटारी जिसे निहारूं
    वे तो नजर न आये
    कहाँ छिपे मनमीत मेरे
    दिल का चैन चुराए .

    छन्दबद्ध कविता का अपना सोंदर्य होता है .सुन्दर प्रस्तुति .

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  2. प्रेम की छन्दानुभूति।

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  3. bahut hi achhi prastuti.....
    bade khoobsurt chhand ban pade hai.......badhai

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  4. बहुत ही मीठी मीठी अनुभूति।

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  5. आप तो बहुत सुन्दर लिखती हैं...बधाई.
    ______________

    'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

    अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  7. हमेशा की तरह एक प्यारी सी प्रस्तुति

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