Thursday, September 9, 2010

अनामिका

नीम अँधेरे सूने घर में
किलक उठी किलकारी
रात अमावस की कालिख में
दीप्त हुई उजियारी ।

मंगलगीत न बजी बधाई
सौगातों का अम्बार न आया
धूमिल छाया जननी पर छाई
सन्नाटों का गुबार है आया ।

किलोल कलरव गुंजित गुंजन
नीरवता कोसों दूर चली
कोना खाली करता मनन
चुपचाप है जीवन नाव चली ।

घर मेरा नहीं पराई हूँ
दैनिक मंत्र जाप था यह
माँ अपनी की कोख जाई हूँ
पराया धन कैसा है यह ।

समय चक्र की गति अविरल
विस्थापित कर दी गई मूल से
नया देस है नया गरल
मुस्कान भा गई मुझे भूल से ।

न जन्मभूमि ने अंक लगाया
ये पूछे कौन देस से आई
जिस आश्रय ने ठौर बिठाया
अपनी निज गरिमा न आई ।

क्या नाम मेरा पहचान मेरी
किस धरा पे खुद को स्थिर करूँ
बसना और बिखरना नियति मेरी
किस सूरज को अचवन मैं करूँ ।

बाबुल की लाडो न रही
प्रिया बनी न अपने पी की
भटकूँ वन-वन पुकार रही
कैसे खोजूं जो अनाम रही ।

17 comments:

  1. घर मेरा नहीं पराई हूँ
    दैनिक मंत्र जाप था यह
    माँ अपनी की कोख जाई हूँ
    पराया धन कैसा है यह ।
    सुंदर भावाव्यक्ति बधाई

    ReplyDelete
  2. एक लड्की की पीडा को बखूबी व्यक्त किया है।

    ReplyDelete
  3. आपकी कविता पढते हुए ६० का दशक याद आ गया -तब कविता का प्रचलित फार्मेट ऐसा ही था .सुन्दर प्रस्तुति .

    ReplyDelete
  4. हर लडकी की पीड़ा लिख डी है ....पर अब वक्त बदल रहा है ...

    ReplyDelete
  5. आप की रचना 10 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

    ReplyDelete
  6. बहुत मर्मस्पर्शी रचना ! इसी प्रश्न का प्रत्युत्तर पाने के लिए स्त्री सदियों से वन वन भटक रही है !

    http://sudhinama.blogspot.com
    http://sadhanavaid.blogspot.com

    ReplyDelete
  7. क्या नाम मेरा पहचान मेरी
    किस धरा पे खुद को स्थिर करूँ
    बसना और बिखरना नियति मेरी
    किस सूरज को अचवन मैं करूँ ।
    tum naari ho... tumse hai sabkuch aur is pahchaan kee swamini tum ... khud ko pahchaano, koi inkaar nahin ker payega

    ReplyDelete
  8. ye nari ke purani baat hai aaj ke nari bhaut shaktishali hai madam jee. nari hokar itne dukhi maat hao. aab ladki ke janam per mangal geet bhi gaye jate hai aur ulas bhi hota.

    ReplyDelete
  9. "नीम अँधेरे सूने घर में
    किलक उठी किलकारी
    रात अमावास की कालिख में
    दीप्त हुई उजियारी ।

    मंगलगीत न बजी बधाई
    सौगातों का अम्बार न आया
    धूमिल छाया जननी पर छाई
    सन्नाटों का गुबार है आया ।"
    aik ajeeb sa ahsas karati hai aapki rachna.aaj bhi jab samay kafi aage badh chala hai,adhikansh logo ki mansikata ko samne lata hai.vishy aur shilp sunder hai aur kvita wah kah gayee hai jo kahna chahati hai.
    lekin aik vichitra samyog kah lein ya hamari bidambana,nari paraya dhan hoti hai shayad isliye bhi ki uske star se apkshit prayas nahi hota unhein samjhane ka jo uske sabse kareeb hota hai.wah yah mankar badh jati hai aurat ki yahi neeyati hai. sunderta se kahi gayee baat.

    ReplyDelete
  10. नारी का दर्द बयां हो गया

    ReplyDelete
  11. Nirmal ji, hamare blog par aakar utsaah badhane aur hamari kavitaaon ko samman dene ke liye dhanyawad. margdarshan ki pratiksha rahegi....

    ReplyDelete
  12. आदरणीय कवियत्री जी आपकी यह कविता पढ़कर, जैसा ऊपर श्री निर्मल गुप्त जी ने कहा है , वाकई ६० के दशक की कविता याद आ गई.. खास तौर पर महादेवी वर्मा जी की कवितायेँ. संवेदना और शिल्प के स्तर पर भी आपकी यह कविता और आपकी अन्य कवितायें छायावादी युग की कविता सी लगती हैं.. .. आपकी कविता पढ़ते हुए मुझे महादेवी जी की प्रसिद्द कविता याद आ गई.. मैं नीर भरी दुःख की बदली... यहाँ प्रस्तुत कर रहा हू.. देखिये कितनी समानता है आपकी कविताओं में ....
    *********
    मैं नीर भरी दुख की बदली!

    स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
    क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
    नयनों में दीपक से जलते,
    पलकों में निर्झणी मचली!

    मेरा पग पग संगीत भरा,
    श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
    नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
    छाया में मलय बयार पली!

    मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल,
    चिंता का भार बनी अविरल,
    रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
    नव जीवन-अंकुर बन निकली!

    पथ न मलिन करता आना,
    पद चिह्न न दे जाता जाना,
    सुधि मेरे आगम की जग में,
    सुख की सिहरन हो अंत खिली!

    विस्तृत नभ का कोई कोना,
    मेरा न कभी अपना होना,
    परिचय इतना इतिहास यही,
    उमड़ी कल थी मिट आज चली!
    **************
    शब्दों के प्रयोग में भी आपका चयन उसी दशक का है.. जैसे... महादेवी जी भी इस कविता में नभ के कोने की बात कर रही हैं.. आपने भी मन के कोने की बात की है..
    समय जरुर बदल गया है लेकिन देश में अब भी वो परिस्थितियां हैं जो ६०-७० के दशक के दौरान थी और साहित्य अपनी उस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हुआ है.. देश में अब भी बेटियों के स्थिति में उतना बदलाव नहीं आया है.. मेट्रो शहरो के बाहर स्थिति अब भी वैसी ही हैं... आपका स्वर.. आपके भाव मुखरित हो.. यही कामना है.. ए़क अच्छी कविता के लिए बधाई!

    ReplyDelete
  13. This comment has been removed by a blog administrator.

    ReplyDelete
  14. नीम अँधेरे सूने घर में
    किलक उठी किलकारी
    रात अमावास की कालिख में
    दीप्त हुई उजियारी ।
    एक लड्की की पीडा !!!!!!नारी का दर्द !!!!!!!मार्मिक परिचय।

    ReplyDelete