Monday, August 13, 2018


Image result for new india



    नया भारत

नई सुबह लेकर आई
नवयुग का सुंदर संदेश
शिक्षा और शान्‍ति लाई
हमसे कमतर हो परदेस ।

बजा नई तकनीक का डमरू
प्रगति ने पॉंव पसारे हैं
खुशहाली ने बांधे घुंघरू
हम उस पर वारी जाते हैं ।

डिजिटल इंडिया की धुन बौराए
योग बना इसकी पहचान
विश्‍व खड़ा बांहें फैलाए
धरा गगन पर हो अधिकार ।

भारत में है गीता सार
बहती निर्मल गंगा की धार
लगता जैसे परियों का देश
इस में ही समाया सुख संदेश ।



Thursday, August 9, 2018

Image result for blind indian man






मन के चक्षु 

इक सूरदास  सा था जीवन
बस चलते ही जाना है
रुकना न कहीं पल भर को
मंजिल तक बढ़ते  जाना है.

किलकारी जब मारी उसने
अपनी माता के आँचल में
सोचा भी न होगा उसने
आरम्भ हुआ अस्ताचल में।

देख न पाया  जननी को
जिसने वार दुलार दिया
मन के चक्षु डूबे अश्रु में
क्या माता का अपमान किया।

जिन नैनो की ज्योति मद्धम
माँ उनको चूम चूम लेती
चलते  चलते जब होता आहत
माँ स्व नैनों में भर लेती।

समय चक्र चल रहा निरंतर
एक सफर को ठौर मिला
शुरुआत नयी करने  को तत्पर
कहीं छूट गया, कहीं और मिला.

(एक दिव्यांग सहकर्मी की सेवा निवृति के अवसर पर )



Thursday, October 27, 2016



Image result for burning diya in dark night

अँधेरा 


अमावस की वो 
काली रात थी 
पर किस्मत जो 
मेरे साथ थी 

घेरे था मुझे 
घुप्प  अँधेरा 
जैसे न होगा 
कभी सवेरा 

गहन तिमिर था 
दोनों बाँहे पसारे 
अनजान बहुत था 
होगा सूरज ओसारे

कोठरी काजल की 
ढेर सी स्याही 
सजे जिन नैनों में 
लगती कितनी प्यारी 

रात थी अँधेरी 
थोड़ी सी लम्बी 
क्या न कटेगी 
लगती थी  दम्भी 

इतने में आई 
बाती  की एक किरन 
सिमटा था तिमिर 
माथे पर न शिकन 

अँधेरा जीता नहीं
पर दे गया बहुत
शाम बीती नहीं 
आऊंगा लौट खुद 

घबराना नहीं तुम 
जाता हूँ दे हौसला 
उजियारा हैं तुम्हीं में 
भरना इसी से घोंसला .

Monday, January 25, 2016


Image result for national flag of india honoured by a little girl


राजपथ से. . . . . . . 

रंग बिरंगे सब फूलों की
सुगंध एक बन जाऊं
तितलियाँ भ्रमर करें परिहास
मैं सारा उपवन महकाऊँ।

सतरंगी मेले में जाकर
रंग तीन चुन लाऊँ
उन रंगों का मेल जोल कर
बस एक तिरंगा लहराऊं।

दुनिया में है धर्म अनेक
कितने नाम गिनाऊँ
सबमें हूँ मैं सर्वश्रेष्ठ
तभी तो मानवता कहलाऊं।

भारतवर्ष प्रिय देश मेरा
बहु संस्कृति समाए
सबको अपने प्रेमपाश में
सम्मोहित करती जाए।

मत बांटो इस धरा को तुम
स्वयं भी तुम बंट जाओगे
जात - पात की लिए कटार
अकेले ही रह जाओगे।

है राष्ट्र बड़ा, सम्मान बड़ा
मानव तुम पूजे जाते हो
मिल जुल कर सब रहें यहाँ
तो देशभक्त कहलाते हो।

मिटा दो वह अदृश्य कलंक
भाई - भाई  से क्रूर हुआ
तिलक करो अब चन्दन का
वैर, द्वेष  सब दूर हुआ।

मिटटी से मिटटी का नाता
वह अपने पास बुलाती है
कुरीतियों का ताना बाना
मन की दूरियां  बढाती है।

हे ईश्वर! मुझको वर  देना
रहे अखंड देश मेरा
साथ मनाऊं  ईद - दिवाली
सहस्त्रों बार आभार तेरा  ।। 






Tuesday, December 15, 2015




Image result for rays of sunlight


धूप के पीछे 


एक सर्द सुबह , गुनगुनी धूप
जाड़ों में कितनी भली लगे
छत का कोना, अखबार हाथ में
एक चाय की प्याली खूब जमे  ।

जीवन की  आपाधापी में
मैं  स्वर्ण रश्मियाँ भूल  गईं
दफ्तर जाने की भागम-भाग
बस तो नहीं मेरी छूट गईं  ।

आफिस में बस काम याद
पीछे क्या कुछ रह जाता है
धूप का वह नन्हा टुकड़ा 
मेरी राह देखता जाता है  ।

फुर्सत के कुछ लम्हों में
खिड़की पर जा बैठी मैं
छनकर आई धूप सुहानी
हौले से फिर गरमाई मैं  ।

कुछ पल बीते , कुछ क्षण बीते
सरक गई कोमल सी धूप
आया एक बादल का टुकड़ा
ले गया छिपा वह नरम धूप  ।

मैं व्याकुल उसको खोज रही
बाहर भीतर, कोई छोर
बड़ी देर में  , दिखा दूर वह
बढ़ता जा रहा क्षितिज की ओर  ।

अगले दिन फिर हुई भोर
आज अंजुरी में भर लूंगी
रखूंगी उसको लगा ह्रदय से
दूर नहीं फिर जाने दूँगी  ।

धूप कहाँ वह रुकने वाली
फिसल गई हाथों से मेरे
आगे बढ़ती जाती वह
मैं आती हूँ पीछे तेरे  ।

मखमली घास का मिला बिछौना
ठहर गई एक पल को वह
मैं जा बैठी संग उसी के
कुछ अपनी कह दूँ, चुप सुनती वह  ।

साँझ हुई , जाने को तत्पर
मन मनुहार करे, रुकने का
संभव नहीं, नियति मेरी
ले लिया वचन, कल आने का  ।              
   
  

Tuesday, June 16, 2015



This Mountain 5879 wallpaper viewed 20641 persons.



शैल 

पहाड़ कहो या गिरि  मुझको
पर मैं हूँ एक प्रहरी  सजग
सीमा पर खड़ा किया मुझको
कर के सबसे अलग थलग

नदियों का उद्गम मुझसे
देती सबको जल निर्मल
कल कल कर बहता जाए
मन को भी करता शीतल

निर्भीक खड़ा रहूँ दिन रैन
जैसे सबल पिता का हाथ
मानसून से करता बात
भीगी धरा वृष्टि के साथ

देख रहा हूँ मैं सबको
पलता ,  बढ़ता आँगन में
पुष्प , कुसुम, तरु , पल्लव
बढ़ते जाएँ प्रागण में

पलते  हैं जीव मुझमें
मेरी कंदरा , गुफाओं में
निर्भीक पनपते आश्रय में
भरता कलोल इनके जीवन में

जड़ी बूटियां हैं असंख्य
सृष्टि के अनमोल रतन
दुर्लभ और अप्राप्य जंतु
विचरते जैसे हो इनका वन

संजीवनी सा सुंदरा सेहरा
आया मैं  प्रभु के भी काम
लगा कितना  मुझ पर पहरा
देवासुर  ने भी जाना दाम

सब कहते पाषाण हूँ मैं
मुझमें भी ह्रदय धड़कता है
सदा उपेक्षित रहता मैं
चन्दन वन यहाँ महकता है

कभी तो आओ मिलने मुझसे
पलक  बिछाए पड़ा  पथ पर  
पथराई अँखियाँ पूछे तुमसे
क्या सृष्टि  वारूँ तुझ पर !




  

Tuesday, December 9, 2014








लब  खामोश हैं 

कौन कहता है कि
बोलने के लिए
कुछ कहने के लिए
शब्दों की है जरुरत

यहाँ तो बिन बोले ही
बिना कुछ कहे ही
एक लम्बी सी
गुफ्तगू हो जाती है

चेहरे के ये भाव
आते हैं जाते हैं
सारा हाल बताते हैं
शब्द ठगे से रह जाते हैं

ये आँखें हैं
मन का आईना
तुम कुछ ना  कहो
ये सब कह जाती हैं

शब्दों को था गुमान
बिन हमारे न बोल पाओगे
यदि हम दें न साथ
कुछ जान नहीं पाओगे

मिथ्या था ये भरम
आई एस  एल  ने है तोडा
शब्दों की ताकत को
संकेतों (SIGNS) ने पीछे छोड़ा  .

( आई एस एल  - Indian Sign Language)
हाल ही में मैंने राष्ट्रीय श्रवण विकलांगता संस्थान (एन  आई एच एच ) से मूक बधिर लोगों की भारतीय सांकेतिक भाषा  का ए  स्तर  का  प्रशिक्षण प्राप्त किया है।  इस दौरान मैंने अनुभव किया कि केवल संकेतों के सहारे भी जीवन कैसे जिया जा सकता है।  यह कविता  हमारे आई इस एल  टीचर्स  को समर्पित है जिन्होंने हमें इस सांकेतिक भाषा का प्रशिक्षण दिया।   उनका बहुत बहुत आभार  .