Tuesday, November 6, 2018


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        दीवाली


दीपों की है कतार दीवाली
मद्धिम लौ की आंच दीवाली
जगमग हो हर बार दीवाली
खुशियों का अम्‍बार दीवाली

जुगनूओं की बारात दीवाली
वन से आएंगे राम दीवाली
उनसे मिलने की आस दीवाली
राग – रंग की रात दीवाली

रागों में मल्‍हार दीवाली
मंदिर में भगवान दीवाली
कोकिल की है कूक दीवाली
नई भोर की आस दीवाली

उम्‍मीदों की किरण दीवाली
शगुनों का है शगुन दीवाली
अंधेरी रात का अंत दीवाली
इंद्रधनुष में चटक दीवाली

हर घर में है दीया दीवाली
वैभव का प्रसार दीवाली 
टूटे दिल का साज दीवाली
जीवन में मधुमास दीवाली ।


Friday, November 2, 2018


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बहुत दिनों के बाद 


निकला है सूरज
बहुत दिनों के बाद

रक्तिम  हुई भोर की लाली
बहुत दिनों के बाद

चहकी है नन्हीं  गौरैया
बहुत दिनों के बाद

बह निकली पुरवाई
बहुत दिनों के बाद

मंदिर में बज उठे शंख
बहुत दिनों के बाद

मन को लग गए पंख
बहुत दिनों के बाद

गहराई यादें मधुर
बहुत दिनों के बाद

पनीली आँखें सकुचाई
बहुत दिनों के बाद 

अधर न कुछ कह पाए
बहुत दिनों के बाद   !




Monday, October 1, 2018


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हिंदी : विश्वभाषा 


आओ सुनाऊं तुम्‍हें एक कहानी
भाषाई महल में थी संस्‍कृत पटरानी 
लेकिन जटिलता बहुत ही बड़ी थी
तनिक भी मिठास, सरलता नहीं थी
नहीं था कभी उसने विस्‍तार पाया
ज्ञानी, साधु, गुरूओं का था प्‍यार पाया
            तब सबने सोचा मिलकर एक हल
            क्‍यों न खोज लाएं एक भाषा सरल
तब आई सतरंगी सी हिन्‍दी ऐसी 
बोलने और लिखने में है एक जैसी
            वर्णमाला है इसकी सबसे व्‍यवस्‍थित
            वैज्ञानिक लिपि देवनागरी अवस्‍थित
हिंदी बन बैठी सब भाषाओं की जननी
अनेक भाषा, बोलियों की निर्मल निर्झरणी
            पूरे भारत और दुनिया में यह बोली जाए
            सहज, सलोनी सी सबको समझ आए
न कोई  दंभ,  अहं दिखाए
सरल, लचीली सी सबको अपनाए
            समृद्ध साहित्‍य से ये इतराए
            हिन्‍दी में भी सूचना क्रांति लाए
भाषाओं के संगम की है ये त्रिवेणी
इसमें समाई हर भाषा बोली
            गॉंवों से चली यह पहुंची विदेश
            लोकगीतों से निकल इंटरनेट में प्रवेश
रस से भरी यह सुधा को समेटे
माथे पर कुमकुम सी आभा लपेटे

            सब त्‍यौहारों का उत्‍सव इससे
            संस्‍कृतियों का उदगम जिससे
सात सुरों की तान है हिंदी
अटल की पहचान है हिंदी

            सिनेमा जगत की रीढ़ है यह
            संगीत प्रेम की पीर है यह
हिन्‍दी है सौहार्द की भाषा
असंभव को संभव करने की आशा
            है मेरी भी सोच यही
            यह उन्‍नत होती जाए
जैसे भारत बना विश्‍वगुरू
वैसे ही हिन्‍दी विश्‍वभाषा कहलाए 

Monday, August 13, 2018


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    नया भारत

नई सुबह लेकर आई
नवयुग का सुंदर संदेश
शिक्षा और शान्‍ति लाई
हमसे कमतर हो परदेस ।

बजा नई तकनीक का डमरू
प्रगति ने पॉंव पसारे हैं
खुशहाली ने बांधे घुंघरू
हम उस पर वारी जाते हैं ।

डिजिटल इंडिया की धुन बौराए
योग बना इसकी पहचान
विश्‍व खड़ा बांहें फैलाए
धरा गगन पर हो अधिकार ।

भारत में है गीता सार
बहती निर्मल गंगा की धार
लगता जैसे परियों का देश
इस में ही समाया सुख संदेश ।



Thursday, August 9, 2018

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मन के चक्षु 

इक सूरदास  सा था जीवन
बस चलते ही जाना है
रुकना न कहीं पल भर को
मंजिल तक बढ़ते  जाना है.

किलकारी जब मारी उसने
अपनी माता के आँचल में
सोचा भी न होगा उसने
आरम्भ हुआ अस्ताचल में।

देख न पाया  जननी को
जिसने वार दुलार दिया
मन के चक्षु डूबे अश्रु में
क्या माता का अपमान किया।

जिन नैनो की ज्योति मद्धम
माँ उनको चूम चूम लेती
चलते  चलते जब होता आहत
माँ स्व नैनों में भर लेती।

समय चक्र चल रहा निरंतर
एक सफर को ठौर मिला
शुरुआत नयी करने  को तत्पर
कहीं छूट गया, कहीं और मिला.

(एक दिव्यांग सहकर्मी की सेवा निवृति के अवसर पर )



Thursday, October 27, 2016



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अँधेरा 


अमावस की वो 
काली रात थी 
पर किस्मत जो 
मेरे साथ थी 

घेरे था मुझे 
घुप्प  अँधेरा 
जैसे न होगा 
कभी सवेरा 

गहन तिमिर था 
दोनों बाँहे पसारे 
अनजान बहुत था 
होगा सूरज ओसारे

कोठरी काजल की 
ढेर सी स्याही 
सजे जिन नैनों में 
लगती कितनी प्यारी 

रात थी अँधेरी 
थोड़ी सी लम्बी 
क्या न कटेगी 
लगती थी  दम्भी 

इतने में आई 
बाती  की एक किरन 
सिमटा था तिमिर 
माथे पर न शिकन 

अँधेरा जीता नहीं
पर दे गया बहुत
शाम बीती नहीं 
आऊंगा लौट खुद 

घबराना नहीं तुम 
जाता हूँ दे हौसला 
उजियारा हैं तुम्हीं में 
भरना इसी से घोंसला .

Monday, January 25, 2016


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राजपथ से. . . . . . . 

रंग बिरंगे सब फूलों की
सुगंध एक बन जाऊं
तितलियाँ भ्रमर करें परिहास
मैं सारा उपवन महकाऊँ।

सतरंगी मेले में जाकर
रंग तीन चुन लाऊँ
उन रंगों का मेल जोल कर
बस एक तिरंगा लहराऊं।

दुनिया में है धर्म अनेक
कितने नाम गिनाऊँ
सबमें हूँ मैं सर्वश्रेष्ठ
तभी तो मानवता कहलाऊं।

भारतवर्ष प्रिय देश मेरा
बहु संस्कृति समाए
सबको अपने प्रेमपाश में
सम्मोहित करती जाए।

मत बांटो इस धरा को तुम
स्वयं भी तुम बंट जाओगे
जात - पात की लिए कटार
अकेले ही रह जाओगे।

है राष्ट्र बड़ा, सम्मान बड़ा
मानव तुम पूजे जाते हो
मिल जुल कर सब रहें यहाँ
तो देशभक्त कहलाते हो।

मिटा दो वह अदृश्य कलंक
भाई - भाई  से क्रूर हुआ
तिलक करो अब चन्दन का
वैर, द्वेष  सब दूर हुआ।

मिटटी से मिटटी का नाता
वह अपने पास बुलाती है
कुरीतियों का ताना बाना
मन की दूरियां  बढाती है।

हे ईश्वर! मुझको वर  देना
रहे अखंड देश मेरा
साथ मनाऊं  ईद - दिवाली
सहस्त्रों बार आभार तेरा  ।।