Saturday, September 11, 2010
कौन हो तुम
आभा गुलाबी
सूरज के प्रकाश सी
रक्तिम लाली
नदी के प्रवाह सी
चंचल इठलाती
चंदा की चांदनी सी
शीतलता फैलाती
सुवासित रजनीगंधा सी
खुशबू बिखराती
मंद मलय सी
कानों में फुसफुसाती
आहलादित मयूरी सी
देख मेघा नाचती
इन्द्रधनुष सी
रंगों को दुलारती
झीनी दीपशिखा सी
मार्ग को दिखाती
लगती अपनी सी
राह निहारती
भोर की किरण सी
ऊर्जा भर जाती
भावों की सम्मोहना सी
खींचे लिए जाती
बूढी पुजारिन सी
बिन कहे समझ जाती
कौन हो तुम
पहेली बूझी न जाती .
Friday, September 10, 2010
तुम्हारे स्पर्श से
शिशु हूँ मैं
थामकर तुम्हारी उँगलियाँ
चढ़ना चाहता हूँ
जीवन की सीढियां ।
अबोध की तरह
अक्षर बोध कराओ मुझे
ताकि समझ सकूं
दुनिया की समझ ।
एक युवा के
सपनों की तरह
आत्मविश्वास से पूरित
छूना चाहता हूँ आकाश ।
एक पुरुष की तरह
अनुप्रिया बनाना चाहता हूँ
ताकि बाँट सकूं तुमसे
भावों का अतिरेक ।
एक वृद्ध की तरह
स्मरण करना चाहता हूँ
थरथराते हाथों से
ज्यों आराध्य हो तुम ।
एक आसक्त की तरह
सम्पूर्ण होना चाहता हूँ
देकर समर्पित समर्पण
तुम्हारे स्पर्श से .
Thursday, September 9, 2010
अनामिका
किलक उठी किलकारी
रात अमावस की कालिख में
दीप्त हुई उजियारी ।
मंगलगीत न बजी बधाई
सौगातों का अम्बार न आया
धूमिल छाया जननी पर छाई
सन्नाटों का गुबार है आया ।
किलोल कलरव गुंजित गुंजन
नीरवता कोसों दूर चली
कोना खाली करता मनन
चुपचाप है जीवन नाव चली ।
घर मेरा नहीं पराई हूँ
दैनिक मंत्र जाप था यह
माँ अपनी की कोख जाई हूँ
पराया धन कैसा है यह ।
समय चक्र की गति अविरल
विस्थापित कर दी गई मूल से
नया देस है नया गरल
मुस्कान भा गई मुझे भूल से ।
न जन्मभूमि ने अंक लगाया
ये पूछे कौन देस से आई
जिस आश्रय ने ठौर बिठाया
अपनी निज गरिमा न आई ।
क्या नाम मेरा पहचान मेरी
किस धरा पे खुद को स्थिर करूँ
बसना और बिखरना नियति मेरी
किस सूरज को अचवन मैं करूँ ।
बाबुल की लाडो न रही
प्रिया बनी न अपने पी की
भटकूँ वन-वन पुकार रही
कैसे खोजूं जो अनाम रही ।
Tuesday, September 7, 2010
आसान है ईश्वर होना
बहुत आसान है
क्योंकि
वहां होना होता है
सभी संवेदनाओं से परे
सभी भावनाओं से ऊपर
और कष्ट देती हैं
यही संवेदनाएं
यही भाव
अच्छा है ईश्वर
हो तुम
सभी प्रभावित करने वाले
भावों से ऊपर
लेकिन
मेरे ईश्वर
ए़क बार मेरे ह्रदय में
देखो करके वास
जान जाओगे तुम
प्रेम करना
अधिक कठिन है
ईश्वर होने से
Saturday, September 4, 2010
बदल लो नजरिया धुंए के प्रति
धुंआ
ऊपर की ओर ही
जाता क्यों है
विज्ञान कहेगा
हवा से हलके होने के कारण
किसी प्रेम करने वाले
ह्रदय से जब पूछोगे
कहेगा आग में
जल कर देखो
कभी मिटाने के लिए भूख
कभी कुंदन करने के लिए सोना
कभी बनाने के लिए इस्पात
कभी प्रेम में किसी के ,
ऊपर ही उठोगे
सभी सीमाओं से ऊपर
प्रेम
ऊपर ही उठाता है
जब भी देखना अब
धुआ
समझना जरुर होगी आग कहीं
चूल्हे में
भट्टी में
दिल में
बदल लो नजरिया
धुंए के प्रति
Friday, September 3, 2010
कहीं कोई चिट्ठी
महका रही है
हंसी की गूँज
गुदगुदा रही है .
तुम्हारी आँखों में
लाज के डोरे
खींचे अपनी ओर
मुझको बुला रहे हैं .
कलाई में बजता
कंगन का जोड़ा
कानो में मेरे
गीत गा रहे हैं .
गालों पर उड़ते
वो आवारा गेसू
लगता है जैसे
मुझको चिढ़ा रहे हैं .
कागज पे तेरा
छुप छुप के लिखना
कहीं कोई चिट्ठी
मेरे गाँव आ रही हैं .
Thursday, September 2, 2010
राधा कृष्ण
१
ना तुम
कृष्ण
ना मैं
राधा
फिर भी
तेरे बिन
मैं आधी
मेरे बिन
तुम आधा
२
ना मैं
गोपी
ना तुम
कन्हैया
फिर भी
कैसे तुम
बन गए
मेरे मन के
खेवैया
३
नहीं तुझमे
सोलह कला
ना ही मुझमे
कोई चमत्कार
कहो ना
फिर भी
क्यों करते हैं हम
राधा कृष्ण सा प्यार