लहरें उतरी आसमान से
कहती हैं सब है मेरा
धीर धरा या नीला नभ
इन सबको हमने है घेरा .
कैसे रूखे रह पाओगे
जीवन प्राण मैं भर दूँगी
अतृप्त रहे न कोई जगत में
तृप्त मैं सबको कर दूँगी .
नदी नाप ले गहराई
पोखर देखे अपनी ऊंचाई
धरती सोख रही है मुझको
देने को अपनी तरुणाई .
दोनों हाथ उलीच रही मैं
भर लो अपना घर आँगन
पुरवाई संग लौट गई तो
रीता न रह जाए उनका मन .
धो दूं सब मन का कलुष
नहला दूं सृष्टि सारी
हरी ओढ़नी पहना दूं
या महका दूं रंगों की क्यारी .
प्रतीक्षा मैं है इन्द्रधनुष
कब खुद पर इतराएगा
बदरा मितवा जब देंगे मौका
सतरंगी छटा दिखायेगा .
मैं आई बड़ी आतुर सी
है सारा जग छाप लिया
बाहर भीतर शीतल कर दूं
तुमने जो मुझको याद किया .
Wednesday, August 11, 2010
जल रहा कश्मीर
बर्फीली घाटियाँ
फूलों की वादियाँ
शोखी की रहनुमाई
यौवन लेता अंगड़ाई ।
फिरती है एक लड़की
कुछ भूली बिसराई
ढूंढ़ती है यादें
है बहुत घबराई ।
खामोश है शिकारे
सूना पड़ा संगीत
केवट है पुकारे
न आये मनमीत ।
धरती का ये स्वर्ग
असुरों ने है घेरा
कहाँ पायें शरण
कहाँ डाले डेरा ।
क्यारी केसर की
महकना है भूली
कली शालीमार की
फिर से न फूली ।
आतंक और जंग
पैठ है लगाये
बारूद की गंध
हर ओर गंधाये ।
लाज पर पहरा नहीं
रक्षित नहीं है आबरू
सब तरफ शमशीर है
जल रहा कश्मीर है ।
फूलों की वादियाँ
शोखी की रहनुमाई
यौवन लेता अंगड़ाई ।
फिरती है एक लड़की
कुछ भूली बिसराई
ढूंढ़ती है यादें
है बहुत घबराई ।
खामोश है शिकारे
सूना पड़ा संगीत
केवट है पुकारे
न आये मनमीत ।
धरती का ये स्वर्ग
असुरों ने है घेरा
कहाँ पायें शरण
कहाँ डाले डेरा ।
क्यारी केसर की
महकना है भूली
कली शालीमार की
फिर से न फूली ।
आतंक और जंग
पैठ है लगाये
बारूद की गंध
हर ओर गंधाये ।
लाज पर पहरा नहीं
रक्षित नहीं है आबरू
सब तरफ शमशीर है
जल रहा कश्मीर है ।
Saturday, August 7, 2010
तेरा संग
प्रीत का रंग
भरा उमंग
तेरा संग
सच्चा आनंद
बाहर सावन
भीतर बसंत
स्वर में वीणा
वाणी मृदंग
आँखें स्वप्निल
ह्रदय अन्तरंग
रूप तुम्हारा
अदभुत बहिरंग
छू लो तुम
कुंदन हो जाऊं
धड़क धड़क
ह्रदय समाऊँ
बन मोहक पुष्प
तेरे केश सजाऊँ
या बन भौंरा
तुझ पर मंडराऊं
जब आसपास
लगे हवा महकने
समझ लेना
मैं लगा बहकने
भरा उमंग
तेरा संग
सच्चा आनंद
बाहर सावन
भीतर बसंत
स्वर में वीणा
वाणी मृदंग
आँखें स्वप्निल
ह्रदय अन्तरंग
रूप तुम्हारा
अदभुत बहिरंग
छू लो तुम
कुंदन हो जाऊं
धड़क धड़क
ह्रदय समाऊँ
बन मोहक पुष्प
तेरे केश सजाऊँ
या बन भौंरा
तुझ पर मंडराऊं
जब आसपास
लगे हवा महकने
समझ लेना
मैं लगा बहकने
Friday, August 6, 2010
सृष्टा हो तुम
नदी की चंचलता
पर्वत की नीरवता
कलियों की गुपचुप
झरने की सरगम
सब मन में होते हैं
जब तुम करीब होती हो ।
ये दुनिया
कितनी
खूबसूरत लगती है
जब तुम हौले से
मुस्कुरा देती हो
झरना बहता है भीतर ।
जब तुम
दूर कर देती हो
दूसरों के दुःख
मैं पहाड़ हो जाता हूँ
दृढ हो जाता हूँ ।
तुम सुखद स्मृति
संगीत तुम्हीं में
तुम सुंदर स्वपन
झंकार तुम्हीं में
ख़ामोशी तुम्हारी
कहती सब बात
बिना सुने
समझो दिल का हाल ।
बहुत कुछ
बना देती हो मुझे
सृष्टा हो तुम ।
पर्वत की नीरवता
कलियों की गुपचुप
झरने की सरगम
सब मन में होते हैं
जब तुम करीब होती हो ।
ये दुनिया
कितनी
खूबसूरत लगती है
जब तुम हौले से
मुस्कुरा देती हो
झरना बहता है भीतर ।
जब तुम
दूर कर देती हो
दूसरों के दुःख
मैं पहाड़ हो जाता हूँ
दृढ हो जाता हूँ ।
तुम सुखद स्मृति
संगीत तुम्हीं में
तुम सुंदर स्वपन
झंकार तुम्हीं में
ख़ामोशी तुम्हारी
कहती सब बात
बिना सुने
समझो दिल का हाल ।
बहुत कुछ
बना देती हो मुझे
सृष्टा हो तुम ।
Thursday, August 5, 2010
समय का ए़क टुकड़ा
समय
ए़क पहिये की तरह है
रुका तो समझो
जिंदगी नहीं
चलता रहे
तो जारी है सफ़र
प्रेम भी
ए़क हिस्सा है
समय का
नहीं जताया जो
फिसल जाता है
समय
बंद मुट्ठी में
रेत की तरह
और उम्र
निकल जाती है
नदी की भांति
एहसास है मुझे
समय चल रहा है
अपनी गति से
और हर सांस के साथ
कम हो रहा है
अपने साथ होने का समय.
छोडो अपनी जिद्द
और लौट आओ
समय का ए़क टुकड़ा
अब भी
संभाले हूँ
अपने आँचल में
ए़क पहिये की तरह है
रुका तो समझो
जिंदगी नहीं
चलता रहे
तो जारी है सफ़र
प्रेम भी
ए़क हिस्सा है
समय का
नहीं जताया जो
फिसल जाता है
समय
बंद मुट्ठी में
रेत की तरह
और उम्र
निकल जाती है
नदी की भांति
एहसास है मुझे
समय चल रहा है
अपनी गति से
और हर सांस के साथ
कम हो रहा है
अपने साथ होने का समय.
छोडो अपनी जिद्द
और लौट आओ
समय का ए़क टुकड़ा
अब भी
संभाले हूँ
अपने आँचल में
Sunday, August 1, 2010
मंजिलें
चल पड़े हैं सफ़र पर
रास्ता कुछ है नया
आशा का दीप लिए
लक्ष्य का क्या पता ।
राहें मिलती हैं नहीं
फासले बढते गए
हर कदम कहता सहम
थम लें ठहर दो कदम ।
अच्छा होता गुजर जाते
मोड़ से अनजान हम
बावरा ये मन भागता
न जाने है क्यों वहीँ ।
आईने से पूछूं भला क्या
जवाब कुछ देता नहीं
मालूम नहीं कुछ चल रहा
क्या रास्ता है यही सही ।
पाना है आकाशकुसुम
कठिन डगर है जाना
जाने कौन मिले हमराही
सपनों को है पाना ।
काली घटाओं के मध्य से
मुझे झांकता है कोई
मदभरे अधखुले नयनों से
मुझे झांकता है कोई ।
प्रयास बढाऊं मैं जितना
वह आगे बढती जाती है
गर तुम हो साथ मेरे
थोड़ी करीब आ जाती है ।
गहन कालिमा दिखती है
पर झिलमिल दूर नहीं है
थककर बैठ गए क्या साथी
अब मंजिल दूर नहीं है ।
रास्ता कुछ है नया
आशा का दीप लिए
लक्ष्य का क्या पता ।
राहें मिलती हैं नहीं
फासले बढते गए
हर कदम कहता सहम
थम लें ठहर दो कदम ।
अच्छा होता गुजर जाते
मोड़ से अनजान हम
बावरा ये मन भागता
न जाने है क्यों वहीँ ।
आईने से पूछूं भला क्या
जवाब कुछ देता नहीं
मालूम नहीं कुछ चल रहा
क्या रास्ता है यही सही ।
पाना है आकाशकुसुम
कठिन डगर है जाना
जाने कौन मिले हमराही
सपनों को है पाना ।
काली घटाओं के मध्य से
मुझे झांकता है कोई
मदभरे अधखुले नयनों से
मुझे झांकता है कोई ।
प्रयास बढाऊं मैं जितना
वह आगे बढती जाती है
गर तुम हो साथ मेरे
थोड़ी करीब आ जाती है ।
गहन कालिमा दिखती है
पर झिलमिल दूर नहीं है
थककर बैठ गए क्या साथी
अब मंजिल दूर नहीं है ।
सावन की झड़ी

बूंदों से बूंदों की होड़ बढ़ी
सावन की कैसे लगी झड़ी
धरा को मिला संपोषित नेह
खिली कोंपलें और तृप्त हुई .
खेतिहरों के माथे सिलवट धुली
बादलों ने जो उठाईं पलकें
जन जन के मन मिसरी घुली
गोरी की अँखियाँ भी छलके .
गगन से लेकर मेरे आँगन
कैसी सजी मोतियों की लड़ी
बैरी बदरा इतना न बरसो
सजना की आती है याद बड़ी .
मतवारे मेघा क्यों हो बौराए
मेरी सुनो तनिक ठहर जाओ
गए है मेरे पिया परदेस
उनकी अटरिया भी बरस आओ .
बीसों पहर झूमकर बरसो
तबहूँ न मोरा जियरा जुड़ाए
अबकी सावन जो लौटेंगे वो
तबहि धधकता कलेजा ठंडाये .
बरखा रानी ह्रदय में समाये
लौट भी जाओ न तडपाओ
अगले चौमासे फिर से आना
संग होंगे प्रियतम बरस के जाना .
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