Tuesday, June 16, 2015



This Mountain 5879 wallpaper viewed 20641 persons.



शैल 

पहाड़ कहो या गिरि  मुझको
पर मैं हूँ एक प्रहरी  सजग
सीमा पर खड़ा किया मुझको
कर के सबसे अलग थलग

नदियों का उद्गम मुझसे
देती सबको जल निर्मल
कल कल कर बहता जाए
मन को भी करता शीतल

निर्भीक खड़ा रहूँ दिन रैन
जैसे सबल पिता का हाथ
मानसून से करता बात
भीगी धरा वृष्टि के साथ

देख रहा हूँ मैं सबको
पलता ,  बढ़ता आँगन में
पुष्प , कुसुम, तरु , पल्लव
बढ़ते जाएँ प्रागण में

पलते  हैं जीव मुझमें
मेरी कंदरा , गुफाओं में
निर्भीक पनपते आश्रय में
भरता कलोल इनके जीवन में

जड़ी बूटियां हैं असंख्य
सृष्टि के अनमोल रतन
दुर्लभ और अप्राप्य जंतु
विचरते जैसे हो इनका वन

संजीवनी सा सुंदरा सेहरा
आया मैं  प्रभु के भी काम
लगा कितना  मुझ पर पहरा
देवासुर  ने भी जाना दाम

सब कहते पाषाण हूँ मैं
मुझमें भी ह्रदय धड़कता है
सदा उपेक्षित रहता मैं
चन्दन वन यहाँ महकता है

कभी तो आओ मिलने मुझसे
पलक  बिछाए पड़ा  पथ पर  
पथराई अँखियाँ पूछे तुमसे
क्या सृष्टि  वारूँ तुझ पर !




  

Tuesday, December 9, 2014








लब  खामोश हैं 

कौन कहता है कि
बोलने के लिए
कुछ कहने के लिए
शब्दों की है जरुरत

यहाँ तो बिन बोले ही
बिना कुछ कहे ही
एक लम्बी सी
गुफ्तगू हो जाती है

चेहरे के ये भाव
आते हैं जाते हैं
सारा हाल बताते हैं
शब्द ठगे से रह जाते हैं

ये आँखें हैं
मन का आईना
तुम कुछ ना  कहो
ये सब कह जाती हैं

शब्दों को था गुमान
बिन हमारे न बोल पाओगे
यदि हम दें न साथ
कुछ जान नहीं पाओगे

मिथ्या था ये भरम
आई एस  एल  ने है तोडा
शब्दों की ताकत को
संकेतों (SIGNS) ने पीछे छोड़ा  .

( आई एस एल  - Indian Sign Language)
हाल ही में मैंने राष्ट्रीय श्रवण विकलांगता संस्थान (एन  आई एच एच ) से मूक बधिर लोगों की भारतीय सांकेतिक भाषा  का ए  स्तर  का  प्रशिक्षण प्राप्त किया है।  इस दौरान मैंने अनुभव किया कि केवल संकेतों के सहारे भी जीवन कैसे जिया जा सकता है।  यह कविता  हमारे आई इस एल  टीचर्स  को समर्पित है जिन्होंने हमें इस सांकेतिक भाषा का प्रशिक्षण दिया।   उनका बहुत बहुत आभार  . 

Sunday, December 16, 2012

सर्दी


कोहरे के आलिंगन में
है भोर ने आँखे खोली
चारों ओर देख कुहासा
न निकली उसकी बोली ।

सरजू भैया मिलें कहीं
तो उनसे सब बोलो
क्यों ओढ़े हो बर्फ रजाई
अब तो आंखे खोलो ।

दर्शन दो, हे आदित्य
जन जीवन क्यों ठहराया है
जड़ चेतन सब कंपकंपा रहे
कैसा कहर बरपाया है ।

नरम धूप का वह टुकड़ा
गुनगुनी सी कितनी भली लगे
फैला दो अपना उजास
चराचर को भी गति मिले

करूँ किसको मैं नमस्कार
तुम तो बस छिपकर बैठे हो
करूँ किसको अर्ध्य अर्पण
तुम तो बस रूठे बैठे हो ।

रक्त जम गया है नस में
पल्लव भी मुरझाया है
डोर खींच ली जीवन की
निर्धन का हांड कंपाया है ।

Wednesday, December 12, 2012

लाडली


आ मेरी नन्ही परी, तुझे गले से लगा लूँ
मेरे आँगन की है तू गोरैया, सौ सौ बार लूँ तेरी बलेयाँ
लाडो मेरी तू चहकती रहे, माँ की सांसो में हरदम महकती रहे
मेरा अक्स है तू, मेरी छाया बनी, सपना बनकर मेरी पलकों में है पली

कितनी सुंदर है तू, मेरी कोमल कली
है कितनी मुलायम, हीरे की कनी
है तू पांच बरस की और मैं पचपन
तुझमे है पाया मैंने बचपन

वो बाबा का आँगन वो आँगन में खटिया
वो अल्हड सी इठलाती बाबा की बिटिया
तितली पकड़ते वो नन्हे फ़रिश्ते
अमरुद चुराते वो शैतान बच्चे

दुःख का कतरा कभी तुम्हे छू न पाए
दाता हर सुख तेरी झोली में गिराए
मुझसे भी ऊँची तू उठती जाये
तुझे देख देख मेरा जिया हरसाए

दुःख कोई जिंदगी में , आने न पाए
सुख का सावन , सदा झूले में झुलाये
तूने भर दिया, मेरे जीवन का सूनापन
तुझमें ही पाया है ,मैंने अपनापन

दुआओं से भर दूँ, मैं दामन तेरा
माँ की ममता बनेगी, कवच तेरा
तू यूँ ही सदा खिलखिलाती रहे
जिंदगी तेरी बस मुस्कुराती रहे

रोम रोम में तू, माँ के है बसती
माँ की आत्मा , तुझमें ही बसती ।

Tuesday, December 11, 2012

विस्मय



सृष्टि की जननी बनकर
है सृष्टा का भेस धरा
वृहत वसुंधरा से बढ़कर
रचयिता ने शरण स्वर्ग भरा ।

माँ कहलाई महिमा पाई
ममता दुलार लुटाती हो
देवों ने भी स्तुति गाई
हर रिश्ते से गुरुतर हो ।

सहोदरा सा रूप मनोरम
छवि अपनी कितनी सुखकर
दो बोल स्नेह भरे अनुपम
लाज बचाने आये ईश्वर ।

भरी पड़ी धरती सारी
सीता जैसी सतियों से
अनुसूया और गार्गी तारी
इस जग को असुरों से ।

इतिहास साक्षी है अपना
अवतरित हुईं दुर्गा कितनी
रानी झाँसी सी वीरांगना
मीरा सी जोगन कितनी ।

कनिष्ठा पर गोवर्धन उठाये
कान्हा कितने इतराते हैं
बरसाने वाली उन्हें नचाये
संग लय ताल ठुमकते हैं ।

हर रूप तुम्हारा रहे अनूप
तुम अनुकरणीय पथगामिनी
युग बदला तुम रहीं अनुरूप
अल्पज्ञ जो कहते अनुगामिनी ।

नारी विस्मय रूप तुम्हारा
नमन करे यह जग सारा
भोर मुखर ले दीप्त सहारा
निशा ढले पा मौन पसारा .

Monday, November 5, 2012

दीया


एक दीया कहे एक दीये से ,

 आओ चलें तम की ओर। 
फैलाएं उजियाप्रकाश का ,
ज्योतिर्मय हो चाहू ओर।

लौ से लौ मिले , 
जगमग है सृष्टि सारी
मिटकर भी दें चांदनी , 
दीप हम, किस्मत हमारी । 


दीवाली हो सबके जीवन में , 
प्रकाश लिए सब आगे जाएँ ।
स्वप्नों में भी जो हो इच्छा 
ईश्वर पूरी करते जाएँ ।

महालक्ष्मी का हो आगमन , 
सबके नेह कुटीर में ,
रुनझुन रुनझुन सी गूंजें , 
सबके परिवेश में ।

हर पल बढे एक दीया , 
मान , सम्मान और वैभव का ।
लौ उसकी जलती रहे , 
इंधन गरिमा - स्नेह का ।


लौ देख तुम्हे मुस्काती रहे
 कि न हो भेंट दीये के तल से ।
दीवाली आपको हो मुबारक ,
शुभकामनाएं  मन से ।


दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं !

Wednesday, July 4, 2012

घन छाये


(पावस की प्रथम बूंदों की प्रतीक्षा में )
















जेठ की तपती दुपहरी 
धरा थी शुष्क दग्ध 
मेघ आये ले सुनहरी 
पावस की बूंदे लब्ध 

संचार सा होने लगा
जी उठी जीवन मिला 
सोया हुआ पंछी जगा 
सुन पुकार कुमुद खिला

अंगार हो  रही धरती 
धैर्य थी धारण किए 
दहकती ज्वाला गिरती
अडिगता का प्रण लिए 

मुरझा गए पुष्प तरू  
मोर मैना थे उदास 
सोचती थी क्या करूँ 
जाए बुझ इसकी प्यास 

सूख गए नदी नार 
ताल तलैया गए रीत 
मछलियाँ पड़ी कगार 
गाये कौन सरस गीत 

टिमटिम उदासी का दीया  
आई ये कैसी रवानी 
हल ने मुख फेर लिया 
पगडण्डी छाई वीरानी    

घन छाये घनघोर बरस 
तृप्ति का उपहार लिए 
इन्द्रधनुष दे जाओ दरस 
रंगों का मनुहार लिए