Wednesday, January 25, 2012

कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव



गायब खेतों  की हरियाली
सड़कों  की देखो बदहाली
उजड़ गई  बरगद की छाँव 
कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव

भूखे सोये अब भी  बुधना
बच्चे मार रही कुपोषण पूतना
आस्तीन में पल रहा जब सांप
कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव

खेतों का लाभ ले गया बाज़ार
किसान ठगा देखता बेज़ार
बिचौलिया संस्कृति फ़ैली हर ठांव
कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव

दिखा क़र्ज़ का आकर्षण
छीन रहे स्वाबलंबन
आयात ने गाड़े फिर अपने पाँव
कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव

10 comments:

  1. Aah!Phirbhee Gantantr Diwas kee aapko shubh kamnayen detee hun!

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  2. विचारणीय प्रश्न ....
    बहुत खुबसूरत रचना
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं....!
    जय हिंद...वंदे मातरम्।

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  3. सार्थक प्रश्न किया है ..

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं....!

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  4. बहुत सुंदर सार्थक प्रस्तुति,भावपूर्ण रचना,..

    WELCOME TO NEW POST --26 जनवरी आया है....
    गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए.....

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  5. हक़ीक़त यही है। स्वावलम्बन को गिरवी रखे भी बहुत वक्त हो गया। यह समय मूल धारा की ओर लौटने का है।

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  6. बहुत सुन्दर!
    63वें गणतन्त्रदिवस की शुभकामनाएँ!

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  7. काश कभी ये दिन बहुरेंगे,
    भारीपन से हम उबरेंगे।

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  8. गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए.....

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  9. ये कैसा गणतंत्र...... जो होना था उससे कुछ उल्ट ही हुआ है.....

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  10. आपने सही तस्वीर उतारी है । अनेक गाँवों में यही हाल है । जब तक गाँ खुशहाल नही होंगे सच्चा लोकतन्त्र आ ही नही सकता

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