Sunday, December 16, 2012

सर्दी


कोहरे के आलिंगन में
है भोर ने आँखे खोली
चारों ओर देख कुहासा
न निकली उसकी बोली ।

सरजू भैया मिलें कहीं
तो उनसे सब बोलो
क्यों ओढ़े हो बर्फ रजाई
अब तो आंखे खोलो ।

दर्शन दो, हे आदित्य
जन जीवन क्यों ठहराया है
जड़ चेतन सब कंपकंपा रहे
कैसा कहर बरपाया है ।

नरम धूप का वह टुकड़ा
गुनगुनी सी कितनी भली लगे
फैला दो अपना उजास
चराचर को भी गति मिले

करूँ किसको मैं नमस्कार
तुम तो बस छिपकर बैठे हो
करूँ किसको अर्ध्य अर्पण
तुम तो बस रूठे बैठे हो ।

रक्त जम गया है नस में
पल्लव भी मुरझाया है
डोर खींच ली जीवन की
निर्धन का हांड कंपाया है ।

8 comments:

  1. निर्धन का हाड़ कँपाया है,

    अत्यन्त प्रभावशाली पंक्तियाँ।

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  2. बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
    अभिव्यक्ति........

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 18/12/12 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका इन्तजार है

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  4. रक्त जम गया है नस में
    पल्लव भी मुरझाया है
    डोर खींच ली जीवन की
    निर्धन का हांड कंपाया है ।

    ...बहुत प्रभावी रचना...

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  5. वाह बहुत बढिया।

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  6. "रक्त जम गया है नस में
    पल्लव भी मुरझाया है
    डोर खींच ली जीवन की
    निर्धन का हांड कंपाया है।"

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