मंजिल
भीड़ से हटकर कुछ
इस तरह बढ़ना है
आसमां को छूकर भी
जमीं पर रहना है |
जमीं ने दिया है हौसला
छूने को नीला आकाश
जाकर मैं उस पर रख दूँ
सुन्दर सा एक सुर्ख पलाश |
भूमि ने है दिया भरोसा
खूब उड़ो तुम नील गगन में
यदि कभी कमजोर पड़े तो
साहस लेना तुम मुझसे |
उत्तम से भी हो अदभुत
पहचान बनाओ एक नई
भीड़ में भी जाओ पहचाने
पीछे हो अनुयायी कई |
कितना भी ऊँचा उड़ जाओ
सांझ ढले तुम आ जाना
धरती भी तो राह निहारे
अपनी मंजिल पा जाना |
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