Friday, December 31, 2010

नया साल आया है

दुल्हन सा बैचैन मन

जागा सारी रात
नए वर्ष के द्वार पर
आ पहुंची बारात । 

शहनाई पर 'भैरवी' 
छेड़े कोई राग 
या फूलों पर तितलियाँ 
लेकर उड़ीं पराग । 

इतनी सी सौगात ला 
आने वाले साल
पीने को पानी मिले 
सस्ता आटा , दाल । 

भाषा, मजहब, प्रान्त के 
झगडे और संघर्ष 
तू ही आकर दूर कर 
मेरे नूतन वर्ष । 

ये बूंदें हैं ओस की 
या मोती का थाल 
आओ देखें गेंहू के 
खेतों में नव साल । 

वो सरसों के खेत में
सपने, खुशियाँ, हर्ष
अपने घर और गाँव भी 
आया है नव वर्ष । 

नई भोर की रश्मियों 
रुको हमारे देश 
अंधियारों से आखिरी 
जंग अभी है शेष । 

Friday, October 1, 2010

रोना न आया

बीज समाया धरती में
अंकुर चाहे देखूं भोर
खींच ली निर्दयी ने
मेरे जीवन की डोर
सुगबुगाना भी न आया ।

सृष्टि के उपवन में
सुकोमल एक कली खिली
कोपल थी अपनी धुन में
किया विलग वो धूल मिली
कुनमुनाना भी न आया ।

कुछ और बरस बीते
उम्र थी देखू सपनों को
ऊँची उड़ान जगत जीते
निर्मोही क़तर गया पंखों को
पलक झपकाना भी न आया ।

मेरे हिस्से का आसमान
मेरी इच्छा बलवती पले
था किसी और का बागवान
सरका दी धरती पाँव तले
जरा डगमगाना भी न आया ।

आहट भेजी जब वसंत ने
फिर से मन बौराया
सपने बुने बावरे नैनों ने
उनका चटक रंग चुराया
फिर भी मुझे रोना न आया .

Wednesday, September 29, 2010

दीपशिखा

जीवन में है गति प्रखर
गतिमान हो बढते जाना है
टेढ़े रस्ते कुछ कठिन डगर
लक्ष्य लक्ष्य को पाना है ।

हमराही मिलते हैं कितने
कुछ दूर चले फिर छूट गए
अनजान सफ़र ठांव इतने
क्यों ठहरे सपने टूट गए ।

मैं चला अकेला अलबेला
संग तुम्हारी याद लिए
तपती मुश्किल राहों पर
शीतल सी तुम्हारी छवि लिए ।

अँधेरे और असमतल पथ पर
सहज हो मैं बढ़ जाता हूँ
दीपशिखा सी आगे चलती
सम्मोहित सा पीछे आता हूँ ।

साथ बिताये दुर्लभ पल
सौगात मेरी है पूँजी प्रिय
संजीवनी सी बहती अविरल
जीऊँ सरस तुम संग प्रिय ।

वामांगी बन रहो मेरी
नहीं विधाता ने चाहा
बनकर अखंड ज्योति मेरी
प्रकाशित मन में मैंने चाहा ।

Monday, September 27, 2010

विस्मय

सृष्टि की जननी बनकर
है सृष्टा का भेस धरा
वृहत वसुंधरा से बढ़कर
रचयिता ने शरण स्वर्ग भरा ।

माँ कहलाई महिमा पाई
ममता दुलार लुटाती हो
देवों ने भी स्तुति गाई
हर रिश्ते से गुरुतर हो ।

सहोदरा सा रूप मनोरम
छवि अपनी कितनी सुखकर
दो बोल स्नेह भरे अनुपम
लाज बचाने आये ईश्वर ।

भरी पड़ी धरती सारी
सीता जैसी सतियों से
अनुसूया और गार्गी तारी
इस जग को असुरों से ।

इतिहास साक्षी है अपना
अवतरित हुईं दुर्गा कितनी
रानी झाँसी सी वीरांगना
मीरा सी जोगन कितनी ।

कनिष्ठा पर गोवर्धन उठाये
कान्हा कितने इतराते हैं
बरसाने वाली उन्हें नचाये
संग लय ताल ठुमकते हैं ।

हर रूप तुम्हारा रहे अनूप
तुम अनुकरणीय पथगामिनी
युग बदला तुम रहीं अनुरूप
अल्पज्ञ जो कहते अनुगामिनी ।

नारी विस्मय रूप तुम्हारा
नमन करे यह जग सारा
भोर मुखर ले दीप्त सहारा
निशा ढले पा मौन पसारा .

Sunday, September 26, 2010

कन्या

कन्या
नहीं मिल रही
का शोर
कानों में पड़ा
मुझे लगा क्या
नवरात्र
शुरू हो गए है ।

इन्हीं दिनों में
होती है
इनकी पूजा
देवी बनाकर
बाकी वर्ष भर
कोई नहीं लेता
इनकी सुध ।

आज भरे है
अखबार
सेलिब्रिटीस की
बेटियों के
गुणगान से
डाटर्स डे है आज ।

खास अवसरों
पर ही होती है
इनकी खोज
बाकी जीवन
तो यों ही
गुमनामी के
अंधेरों में
दम तोड़ देता है ।

अक्सर
शिक्षित माता पिता ही
दिखाई देते है
महिला डाक्टर
से करते विनती
कन्या भूर्ण हत्या के लिए ।

जनसँख्या
में घट रहा है
अनुपात
बेटियों का
चिंताजनक रूप से ।

सरकार
को लानी
पड़ रही हैं
स्कीमें
देने पड़ रहे हैं
प्रलोभन
बेटी बचाओ
इसे भी जीने दो ।

माँ के गर्भ
में आने
से लेकर
शिक्षा कैरियर
और शादी तक
सब निशुल्क ।

फिर भी
नहीं तैयार
कोई पिता
बनने को
पालक पुत्री का ।

Thursday, September 23, 2010

निर्वासन

रामलला
अपनी ही माँ
को "माँ " पुकारने
के लिए
माँगा जा रहा है
तुमसे तुम्हारे
जन्म का प्रमाण ।

कितने डी एन ए टेस्ट
से गुजरोगे
अपने ही घर में
आने के लिए
पार करनी होगी
कितने निर्दोषों के
रक्त की वैतरणी
जिन्हें तुम्हारे नाम पर
चढ़ा दिया गया बलि ।

सूर्यवंशियों के
शौर्य में नहीं है
सूर्य की चमक
शांत सरयू भी
नहीं दे पा रही
कोई साक्ष्य
जहां जल समाधि
ली थी तुमने ।

फैसले की
नंगी कटार
लटकी है
तुम्हारे सिर पर
ठीक उसी तरह
जैसे ली थी तुमने
अग्नि-परीक्षा
सीता की ।

कभी रखने को
पिता का वचन
माँ के
एक इशारे पर
काटा था वनवास
आज फिर
भोगना है तुम्हें
निर्वासन
तय नहीं जिसकी
अवधि ।

लेकिन पुरुषोत्तम
ना तो तब
मानस के ह्रदय से
निर्वासित हुए थे तुम
ना ही
अब हो पाओगे ।

Wednesday, September 22, 2010

आह ! पानी

तूफ़ान उड़ा कर ले गया
मेरे घरौंदे की छत को
जल मग्न कर गया
मेरी आशा और सपनों को .

बेबस देखती मैं रह गई
करूँ क्या कुछ सूझा नहीं
प्रकृति की भ्रकुटि तनी हुई
बचाऊँ क्या कुछ बचा नहीं .

पलायन परोस रहा पानी
नदियों में उफनता हाहाकार
सच लगे कि दुनिया है जानी
देख मेघों का प्रबल प्रहार .

इन्द्रदेव क्यों रुष्ट हुए
पानी पानी कर दिया जगत
तनिक रुको सब पस्त हुए
जन जीवन है हुआ त्रस्त .

यमुना तट पर ठगी खड़ी
चिन्ह न शेष ठिकाने का
तांडव लहरें उठती गिरती
पानी भी सूख गया आँखों का .