Tuesday, December 11, 2012

विस्मय



सृष्टि की जननी बनकर
है सृष्टा का भेस धरा
वृहत वसुंधरा से बढ़कर
रचयिता ने शरण स्वर्ग भरा ।

माँ कहलाई महिमा पाई
ममता दुलार लुटाती हो
देवों ने भी स्तुति गाई
हर रिश्ते से गुरुतर हो ।

सहोदरा सा रूप मनोरम
छवि अपनी कितनी सुखकर
दो बोल स्नेह भरे अनुपम
लाज बचाने आये ईश्वर ।

भरी पड़ी धरती सारी
सीता जैसी सतियों से
अनुसूया और गार्गी तारी
इस जग को असुरों से ।

इतिहास साक्षी है अपना
अवतरित हुईं दुर्गा कितनी
रानी झाँसी सी वीरांगना
मीरा सी जोगन कितनी ।

कनिष्ठा पर गोवर्धन उठाये
कान्हा कितने इतराते हैं
बरसाने वाली उन्हें नचाये
संग लय ताल ठुमकते हैं ।

हर रूप तुम्हारा रहे अनूप
तुम अनुकरणीय पथगामिनी
युग बदला तुम रहीं अनुरूप
अल्पज्ञ जो कहते अनुगामिनी ।

नारी विस्मय रूप तुम्हारा
नमन करे यह जग सारा
भोर मुखर ले दीप्त सहारा
निशा ढले पा मौन पसारा .

Monday, November 5, 2012

दीया


एक दीया कहे एक दीये से ,

 आओ चलें तम की ओर। 
फैलाएं उजियाप्रकाश का ,
ज्योतिर्मय हो चाहू ओर।

लौ से लौ मिले , 
जगमग है सृष्टि सारी
मिटकर भी दें चांदनी , 
दीप हम, किस्मत हमारी । 


दीवाली हो सबके जीवन में , 
प्रकाश लिए सब आगे जाएँ ।
स्वप्नों में भी जो हो इच्छा 
ईश्वर पूरी करते जाएँ ।

महालक्ष्मी का हो आगमन , 
सबके नेह कुटीर में ,
रुनझुन रुनझुन सी गूंजें , 
सबके परिवेश में ।

हर पल बढे एक दीया , 
मान , सम्मान और वैभव का ।
लौ उसकी जलती रहे , 
इंधन गरिमा - स्नेह का ।


लौ देख तुम्हे मुस्काती रहे
 कि न हो भेंट दीये के तल से ।
दीवाली आपको हो मुबारक ,
शुभकामनाएं  मन से ।


दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं !

Wednesday, July 4, 2012

घन छाये


(पावस की प्रथम बूंदों की प्रतीक्षा में )
















जेठ की तपती दुपहरी 
धरा थी शुष्क दग्ध 
मेघ आये ले सुनहरी 
पावस की बूंदे लब्ध 

संचार सा होने लगा
जी उठी जीवन मिला 
सोया हुआ पंछी जगा 
सुन पुकार कुमुद खिला

अंगार हो  रही धरती 
धैर्य थी धारण किए 
दहकती ज्वाला गिरती
अडिगता का प्रण लिए 

मुरझा गए पुष्प तरू  
मोर मैना थे उदास 
सोचती थी क्या करूँ 
जाए बुझ इसकी प्यास 

सूख गए नदी नार 
ताल तलैया गए रीत 
मछलियाँ पड़ी कगार 
गाये कौन सरस गीत 

टिमटिम उदासी का दीया  
आई ये कैसी रवानी 
हल ने मुख फेर लिया 
पगडण्डी छाई वीरानी    

घन छाये घनघोर बरस 
तृप्ति का उपहार लिए 
इन्द्रधनुष दे जाओ दरस 
रंगों का मनुहार लिए 

Monday, May 28, 2012

लगता है कुछ तुम सा


(चित्र गूगल से साभार )

 
स्मृति की सीप से 
एक मोती है उपजा 
स्निग्ध श्वेत धवल 
लगता है कुछ तुम सा


स्नेह का पल्लव 
लाने को है आतुर सा 
प्रीत का पुष्प 
लगता है कुछ तुम सा



बिछोह के घन 
भर देते हैं तम सा 
जरूर बरसेगा अनुराग
लगता है कुछ तुम सा


लिए कुटिल मुस्कान
निराशा की निशा 
होगा आशा का सवेरा 
लगता है कुछ तुम सा


सपनों का पुलिंदा 
प्रतीक्षा में  कसमसाता 
कभी तो होगा सच 
लगता है कुछ तुम सा



नभ में सरकता चंदा 
मेरे आँगन जो पहुंचा
करता है ताक-झांक 
लगता है कुछ तुम सा



गौरैया का भोर गान 
गुनगुन भ्रमर सा 
पिहू पिहू पपीहा 
लगता है कुछ तुम सा


मंदिर में मंत्रोच्चार 
ईश्वर उसमें बसा 
शंख का जय गान 
लगता है कुछ तुम सा .

Tuesday, May 1, 2012

पृथ्वी थकती नहीं


(चित्र गूगल से साभार )


गतिमान है  धुरी पर 

परिक्रमा करनी है पूरी 

प्रहर गिनती पोरों पर

कहीं दूर न हो  दूरी



गर्भ में बैठे मानिक मोती 

एक दूजे से बतियाते हैं 

धीर धरा हमको ढोती

तभी अमूल्य कहाते हैं



दिखती कितनी शान्तमना

धधकता भीतर ज्वालामुखी 

जल का अपार सैलाब बना 

माथे हिमगिरि पर न दुखी 



बनी सारथि सृष्टि की 

सृष्टा का आधार हो तुम 

वाहिनी बनी चराचर की 

कंचन सी कल्पना तुम



पल पल पल्लवित जीवन

जीने की उमंग तुमसे  

तुम हो कितनी पावन 

धर्म कर्म परिभाषा तुमसे 



देवों ने भी जन्म लिया 

आँचल में छिप जाने को 

ममता का मीठा भोग दिया

मठ में पूजे जाने को 



आज धरा है तार तार 

लहू से लहूलुहान हुई 

मानवता सिसके द्वार  

अपनों से ही बर्बाद हुई 



आस लगाये धैर्य धारिणी 

धानी चूनर खोएगी नहीं 

अमन चैन की खेवन हारिणी

पृथ्वी कभी थकती नहीं .      

Monday, April 23, 2012

यशोधरा

(ख्यातिप्राप्त चित्रकार मंजीत सिंह जी का चित्र वियोगिनी यशोधरा -साभार  )

यशोधरा सी एक नारी
बनी कुंवर  की वामांगी
महलों की थी राजदुलारी
आज बनी विरह की मारी

फूलों का गलियारा चलते
कदम जहाँ थक जाते थे
सारे सुख  वैभव मंडराते
राहों में बिछ जाते थे

कामदेव सा पुरुष मिला
सिद्धार्थ नाम कहाते थे
राजप्रसाद में पुष्प खिला
सब बलिहारी जाते थे

नाजों के पाले हुए कुमार
देखी न दुःख की छाया
जर्जर देह न दिखा बुखार
वैभव की कुछ ऐसी माया 

लचक लता सी महारानी 
अहोभाग्य मनाती  थी
विधना के मन की न जानी
फूलों की सेज सजाती थी

पति था उसका एक संत
जग को उसने सन्देश दिया
सारे सुखों का दिखा पंथ
मानवता पर उपकार विशेष किया

धन्य हुआ सारा संसार
गुणगान बुद्ध के हैं गाते
रनिवास में गूंगी हुई झंकार
सूखे पत्ते उड़  हैं आते .   

Wednesday, April 11, 2012

रिश्ते




फुर्सत के कुछ लम्हों में
मन करता चिंतन मनन
रिश्तों ने जकड़ा पाश में
अवरुद्ध किया है दूर गमन

क्या ही अच्छा रहता
स्वछंद विचरता हर प्राणी
भूख नहीं न भूखा होता
याचक नहीं न रहता दानी

भौतिक सुख के उपादान
संचय क्या करता हठी
नचा रहा सुर सुन्दर गान
ऊँगली पर अपनी सदा नटी

कच्चे धागे से बंध आये
द्रौपदी की लाज बचाने
रेशम डोर से न बच पाए
चाहे व्यस्त हों रास रचाने

ममता का अदृश्य बंधन
जग में सबसे हुआ महान
रिश्तों का महीन मंथन
सब सुखों की बना खदान

नाता एक अनोखा सा
मानवता से मानव का
पशु पक्षियों को भाता सा
करुणा ममता और दया का

कुछ विचित्र सा सम्मोहन
कविता का है भावों से
शब्दों का सजा के तोरण
लयबद्ध रागमय छंदों से.