Saturday, January 28, 2012

 

आया वसंत मेरे गाँव 

शीत की प्रीत छोड़ 
धूप ने बढ़ाये पाँव 
ठिठुरन से मुख मोड़ 
आया वसंत मेरे गाँव 

खिल उठी हैं रश्मियाँ 
लुटा रही स्वर्ण राशि
रहे न कहीं कमियां 
छाये न कोई उदासी 

कली सुगबुगा उठी 
खिलने की ऋतु आई
भ्रमर तितली मचल पड़ी 
गुनगुन की बेला लाई 

पलाश भी दहक उठा 
किसकी मांग मैं बसूँ 
ह्रदय में उफन रहा 
किसके गालों पर सजूँ

कोकिल भी बावरी सी 
खोज रही एक आँगन 
तान छेड़ रही मधुर सी 
गोरी का खनका कंगन 

तैयारियां यौवन पर हैं 
फागुन और फाग की 
दोनों ही दुविधा में हैं 
चिंता बढ़ी रंग राग की 

सरसों भी लहलहा उठी 
धारण किए पीत पट 
प्रिय की फिर हूक उठी 
बेल  सी जाऊं लिपट .  

Wednesday, January 25, 2012

कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव



गायब खेतों  की हरियाली
सड़कों  की देखो बदहाली
उजड़ गई  बरगद की छाँव 
कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव

भूखे सोये अब भी  बुधना
बच्चे मार रही कुपोषण पूतना
आस्तीन में पल रहा जब सांप
कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव

खेतों का लाभ ले गया बाज़ार
किसान ठगा देखता बेज़ार
बिचौलिया संस्कृति फ़ैली हर ठांव
कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव

दिखा क़र्ज़ का आकर्षण
छीन रहे स्वाबलंबन
आयात ने गाड़े फिर अपने पाँव
कैसे गणतंत्र मने मेरे गाँव

Friday, January 13, 2012

पंचवटी

पंचवटी: भारतीय संस्कृति में एक अहम् स्थान रखती है.  
आचार्य मैथिली शरण गुप्त जी  के पंचवटी से प्रेरित होकर एक  खंड काव्य लिखना चाह रही हूँ. राष्ट्रकवि के पंचवटी की धूलि भी लिख सकी तो मैं स्वयं को धन्य मानूंगी.  प्रस्तुत है  कुछ अंश 






अयोध्या नगरी धन्य हुई 
जब भुवन में गूंजी किलकारी
माता  की ममता तृप्त भई
सुर, नर, मुनि जाएँ बलिहारी  

अप्सरा सी तीन रानियाँ 
कैकेयी थी उनमें कुछ खास  
अतिरिक्त प्रेम था  राजा का
विशेष बहुत उसमें थी बात 

ह्रदय के बेहद निकट थी वह 
प्रेम बरसता था राजा का 
उसकी वाणी अकट सत्य 
स्वीकार्य स्नेह था  प्रजा का  

निपुण बहुत युद्ध कौशल पाया 
राजा दशरथ के मन भाया  
युद्धभूमि में साथ निभाया 
उपहार था दो वचनों का पाया 

राज्याभिषेक राम का था 
पर होनी को स्वीकार्य नहीं 
लक्ष्य और विधना ने रचा था
भोग विलास पुरुषार्थ नहीं   

नृप का प्राणहन्ता  बना वचन
राम को मिला गहन वनवास
भातृ प्रेम की हुई परीक्षा 
सीता ने ग्रहण किया प्रवास  

पुरुषोत्तम लिए मर्यादा को  
वन को था प्रस्थान किया 
रघुकुल की रीत निभाने को 
वचन पिता का मान लिया 

जा पहुंचे सरयू  तट पर 
कलकल बहती थी धारा 
तोड़ किनारा पैर पखारूँ 
मचल  उफन रहती धारा 

नदी पार करने की खातिर 
प्रभू ने केवट से की अनुनय 
भोला सा मुख देख  राम का 
अवाक खड़ा करबद्ध विनय 

सहरी सा परिवार मेरा 
नैया ही एक सहारा है 
चरणरज आपकी है जादू 
नाव यदि बन गई नारी 

कौन सहारा होगा मेरा 
परिवार का मेरे पालनहार 
बिन पैर पखारे चढ़ने न दूं
क्षमा प्रभु जग खेवनहार 

केवट ने धोये पाँव 
सरयू जल और अश्रु से 
देख के वह  निर्मल श्रद्धा
नीर बह गए नैनों से 

नाव बिठाये सिया राम को  
केवट चला दूसरे छोर 
सारे जग  के पार लगैया 
केवट के हाथ थमा दी डोर  

वैतरणी बनी नाव साधारण 
जग के स्वामी थे सवार हुए 
पतिव्रता का तेज असाधारण 
लक्ष्मण तनिक विचलित न हुए

पार पहुँच गए लखन जानकी 
राम मुद्रिका दें उतराई 
केवट को कुछ समझ न आये 
मंद मधुर मुस्काते रघुराई 

सब जा पहुंचे मध्य अरण्य  
प्रतीक्षा में था भविष्य खड़ा 
यहीं बनाये पर्ण कुटीर 
था पंचवटी का भाग्य बड़ा 

ठहर गया मलय समीर 
पंचवटी में देख उन्हें 
जीव जंतु स्तब्ध अधीर 
कौतुक से निहारें निर्मिमेष 

नाजों से नाजुक जनकदुलारी 
पैरों में पड़ गए छाले
फूल से कोमल सुकुमारी 
था काँटों पर चलना भारी

चंदा सूरज से राजकुंवर 
तल्लीन थे कुटी बनाने में 
सीता सी प्यारी रमणी 
सुध खोई उसे निहारने में 

कुटीर बन तैयार हुआ 
सिया ने फूंके उसमें प्राण 
महलों का सुख वैभव तज
जंगल में मंगल करती आन 

एक तपस्वी लक्ष्मण सा 
कुटिया का बन गया प्रहरी
वन के जीव जंतु हर्षाते 
वटी में बहती सुख लहरी 

अथक अनुयायी सियाराम का
दिन हो या कि रात अँधेरी 
विश्राम नींद का किया त्याग 
भातृ प्रेम की करते फेरी 
                                
                                     क्रमशः 

Thursday, January 5, 2012

बहुत दिनों बाद














 आज धूप 
थोड़ी अधिक खिली है
पत्तों में है
नया हरापन 
बहुत दिनों बाद

आज फूल 
थोड़े अधिक चटक हैं 
उनकी लाली में है 
कुछ हया 
बहुत दिनों बाद 

आज भँवरे 
थोड़े अधिक गुनगुना रहे हैं 
उनके गीतों में है 
कुछ प्रणय 
बहुत दिनों बाद 

आज कलियाँ 
थोड़ी अधिक चहक रही हैं 
उनके खिलने में है 
कुछ ही पल 
बहुत दिनों बाद 

आज पुरवाई 
थोड़ी अधिक बावरी है 
उसकी गति में है 
कहीं पहुँचने की जल्दी 
बहुत दिनों बाद 

आज कोकिल 
थोड़ी अधिक कूक रही है 
उसकी बोली में है 
कोई छिपा सन्देश 
बहुत दिनों बाद  

आज मंजरियाँ 
थोड़ी अधिक झूल रही हैं 
उसकी लटों में हैं
आलिंगन की उत्कंठा 
बहुत दिनों बाद .