मेरे भाव
Sunday, December 16, 2012
सर्दी
›
कोहरे के आलिंगन में है भोर ने आँखे खोली चारों ओर देख कुहासा न निकली उसकी बोली । सरजू भैया मिलें कहीं तो उनसे सब बोलो क्यों ओढ़े हो...
6 comments:
Wednesday, December 12, 2012
लाडली
›
आ मेरी नन्ही परी, तुझे गले से लगा लूँ मेरे आँगन की है तू गोरैया, सौ सौ बार लूँ तेरी बलेयाँ लाडो मेरी तू चहकती रहे, मा...
7 comments:
Tuesday, December 11, 2012
विस्मय
›
सृष्टि की जननी बनकर है सृष्टा का भेस धरा वृहत वसुंधरा से बढ़कर रचयिता ने शरण स्वर्ग भरा । माँ कहलाई महिमा पाई ममता दुल...
4 comments:
Monday, November 5, 2012
दीया
›
एक दीया कहे एक दीये से , आओ चलें तम की ओर। फैलाएं उजियाप्रकाश का , ज्योतिर्मय हो चाहू ओर। लौ से लौ मिले , जगमग है सृष्टि सार...
5 comments:
Wednesday, July 4, 2012
घन छाये
›
(पावस की प्रथम बूंदों की प्रतीक्षा में ) जेठ की तपती दुपहरी धरा थी शुष्क दग्ध मेघ आये ले सु...
13 comments:
Monday, May 28, 2012
लगता है कुछ तुम सा
›
(चित्र गूगल से साभार ) स्मृति की सीप से एक मोती है उपजा स्निग्ध श्वेत धवल लगता है कुछ तुम सा स्नेह...
9 comments:
Tuesday, May 1, 2012
पृथ्वी थकती नहीं
›
(चित्र गूगल से साभार ) गतिमान है धुरी पर परिक्रमा करनी है पूरी प्रहर गिनती पोरों पर कहीं दूर न हो दूरी ...
6 comments:
‹
›
Home
View web version